Saturday, August 23, 2008

दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी

(मूल अँग्रेजी से हिन्दी अनुवाद - डॉ. राज गोस्वामी)
सूरज उगने को था
दक्षिण जाने वाली
रेलगाड़ी
स्टेशन पर रुकती है।

मैं
गेट के पास
प्रतीक्षा करता हूँ।
तीसरे कम्पार्टमेन्ट से
वो
उतरती है।

कांधे से टंगा हैण्डबैग
ऑंखों पर काले कूलिंग ग्लासिस
दाहिने हाथ में फूल छपा छाता
किसी को न देखते हुए
सीधी
सेन्ट्रल एवेन्यू की तरफ
चली जाती है।

टिकिट कलेक्टर,
उससे
टिकिट के बारे में नहीं पूँछता।
शायद
उसको मालूम होगा
उसके पास
एम.एस.टी. होगी।

मैं
रहस्यमय ढंग से
उसके
पीछे हो जाता हूँ।

मोहल्ले के
तीसरे मोड़ पर
वह
अदृश्य हो जाती है।
शायद
वहीं स्कूल में शिक्षिका होगी।
मैं गम्भीरता से
पीछे मुड़ जाता हूँ।

घर जाकर
रिफरेन्स किताबें लेकर
यूनिवर्सिटी चला जाता हूँ।
लाइब्रेरी में बैठकर
जानकीट्स के ऊपर
थीसिस लिखने लगता हूँ,
तब
सफेद कागज पर
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
मंद-सी दिखती है!
ठीक
तीसरे कम्पार्टमेन्ट से
वो, उतरती
अस्पष्टता-सी दिखाई देती है।

रात को
जब मै लेटता हूँ
अचानक
चौंक जाता हूँ।

दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
कूकती
सुनाई पड़ती है।

चश्मा लगाकर
वह
रेलगाड़ी से उतरती है
ऐसा भ्रम होता है।
तीसरे पहर पर
कष्ट से
नींद में गिर जाता हूँ।

कभी-कभी
वह रेलगाड़ी लेट आती है
मैं
गेट के पास।
टिकिट कलेक्टर
मेरी ओर
नाराजगी से देखता है।
लेकिन
रहम खाता है।
वो
तीसरे कम्पार्टमेन्ट से
उतर कर
हड़बड़ाकर
सेन्ट्रल एवेन्यू की तरफ
दौड़ती है।
शायद
टाइम हो गया होगा।

मैं भी पीछा करता हूँ।
कभी-कभी
वो
अपने चश्मे को सम्भालती है
शायद
उसने मुझे देख लिया होगा।

मैं
शरमाते हुए
तिरछी नजरों से
देखता हूँ।

मोहल्ले में
तीसरे मोड़ के पास
पीछे मुड़कर
वह
मेरी ओर देखती है -
मैं
अवाक्
खड़ा रह जाता हूँ
उतने में
वह अदृश्य हो जाती है।
आखिर में
जो नजरें मेरी ओर फेंकती है
वो
दिन भर मुझे यादगार रहती हैं।

रविवार
अथवा
अवकाश के दिनों
वह नहीं आती है।
मैं तो स्टेशन पर
प्रतीक्षारत्
खड़ा रहता हूँ।
ठीक समय पर
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
स्टेशन पर रुकती है।
उस रोज
नहीं आती करके
मुझे
मालूम होने के बाबजूद भी
मेरी सम्पूर्ण नजरें
तीसरे कम्पार्टमेन्ट के ऊपर ही
ठहर जाती है।
इंजन
ताकत से डिब्बों को खींचता है -
थोड़ी देर में
रेलगाड़ी रफ्तार लेती है -
मैं तो
गेट के पास खड़ा होकर,
पूरी गाड़ी गुजरने तक
देखता रह जाता हूँ।
पहाड़ के मोड़ पर
रेलगाड़ी
अदृश्य होने के बाद
हिलता हूँ।

तब तक
टिकिट कलेक्टर
प्लेटफार्म पर
इधर उधर घूमते
रेल्वे पोर्टर
पटरियों की मरम्मत करने वाला गैंगमैंन
झण्डी को हिलाने वाला स्टेशन मास्टर
सभी
मुझे ऐसे ही देखते रहते हैं
मगर
मैं कुछ भी फील नहीं करता हूँ।

रोज की भाँति
सूरज
उगते समय
स्टेशन के पास खड़ा हो गया।
सूरज उगा
थोड़ी देर में
और विकसित हो गया।
बहुत समय हो गया
फिर भी
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
नहीं आई।
स्टेशन पर यात्री कम थे
टिकिट कलेक्टर न दिखा
पोर्टर प्लेटफार्म पर न मिला
गेंगमेन का पता न था
अंत में
स्टेशन मास्टर से पूछा-
ज्ञात हुआ
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी का
बारह मील की दूरी पर ऐक्सीडेन्ट हो गया।

मेरा दिल
रफ्तार से कँपने लगा।
एकदम
ऐक्सीडेन्ट स्थल पर
दौड़ कर पहुँचा
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
पटरी से उतर गई
तीसरा कम्पार्टमेन्ट नीचे गिर गया था।
शायद
शव हो सकते हैं
उसी के ऊपर
सफेद कपड़ा चढ़ा था।
रिलीफ टीम
और कुछ शवों को
बाहर निकलवा रही थी।

मैं
हड़बड़ाकर ढूँढ रहा था
एक जगह
लंबा हैण्ड बैग
काला चश्मा
फूल छपा छाता
दिख गया था।
बगल में
उसी का शव
मेरा दिल रो पड़ा।

शाम तक
उत्तर के कुछ लोग आये।
शायद
उसी के लोग होंगे
उसका शव
कार में लेकर
उत्तर की ओर चले गये।
और
मैं ऑंसू लिये
दक्षिण की ओर
चला गया।

एक सप्ताह के बाद
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
पुन: आने लगी।
मैं गेट के पास
इंतजार करता हूँ
तीसरे कम्पार्टमेन्ट को ढूँढता हूँ।
वो नहीं आएगी,
मुझे मालूम है
वो नहीं है
मुझे मालूम है।

फिर भी
मैं
ढूँढता हूँ
रेलगाड़ी हाँफती हुई
चली जाती है।

टिकिट कलेक्टर
रेलवे पोर्टर
गैंगमेन
स्टेशन मास्टर
सभी
मुझे ऐसे ही देखते हैं।
पहले तो कुछ था
मगर
अभी वो नहीं होने के बाबजूद भी
मैं
स्टेशन के पास क्यों इन्तजार करता हूँ
सोचकर
सभी
मेरी खिल्ली उड़ाते हैं।

टिकिट कलेक्टर ने
मुझे पागल कह दिया।
रेलवे पोर्टर ने
उन्मादी बोला।
गैंगमेन ने
उसे भूल जाने के लिये सुझाव दिया।
स्टेशन मास्टर ने
मुझे
स्टेशन नहीं आने के लिये सचेत किया।

फिर भी
ठीक
सूरज उगते समय
मैं
स्टेशन गेट के पास
इंतजार में रहता हूँ।

उसी समय
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी
कूकती आवाज में
स्टेशन पर रुकती है
सभी कम्पार्टमेन्ट्स ढूँढता हूँ।
दूर -
पहाड़ के मोड़ पर
रेलगाड़ी गायब होने तक
मैं
पूरे शरीर को
ऑंखें बना कर देखता हूँ।
टिकिट कलेक्टर,
रेलवे पोर्टर
गैंगमेन
स्टेशन मास्टर
मुझे ऐसे ही देखते हैं।

मैंने उसको प्यार किया
सभी को पता है।
मगर
मैंने
दक्षिण जाने वाली रेलगाड़ी को भी
प्यार किया है।
यह कितने लोगों को मालूम होगा?

उसी रेलगाड़ी में
हरदम
मैं उसी के प्रतिबिम्ब को देखता हूँ।यह कितने लोगों को मालूम होगा?

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